बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत के छह पार्षदों ने अपने ही अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जनता के समक्ष विकास के झूठे वादों से हार रहे इन पार्षदों ने खुद आगे आकर अपनी सही तस्वीर बताने का प्रयास किया है कि विकास हो नहीं रहा और जो कहीं हो रहा है, उन बारे वह नहीं जानते। वर्ष 2014 से विरोध के बीच शुरू हुई बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत में अंतिम सहमति लोगों ने इस कारण बनाई थी कि विकास की बढ़त में यह जरूरी है और सुविधाएं भी उन्हें मिलेगी। उस समय यहां की 10 हजार से अधिक की आबादी को सफाई से लेकर स्वच्छ पेयजल, पक्के रास्तों से लेकर स्ट्रीट लाइट व दोनों शहरों में पार्किंग से लेकर बेहतरीन सफाई व्यवस्था के बड़े बड़े सब्जबाग दिखाए गए थे। इन्हीं उम्मीदों के आसरे कुछ विरोध के बाद सभी 11 वार्डों के लोगों ने अपना समर्थन नगर पंचायत को दिया। उम्मीद विकास की थी, लेकिन यह उम्मीद आज तीन साल के कार्यकाल की तरफ बढ़ रही नगर पंचायत पूरी ही नहीं करवा पाई है। अब स्ट्रीट लाइट के सहारे यहां के लोगों को विकास की कुछ रोशनी दिखाने का प्रयास तो किया जा रहा है। लेकिन सफाई व्यवस्था में नगर पंचायत इस कदर पिट चुकी है कि यह रोशनी कुछ नहीं कर पा रही है। सभी वार्डों के टूटे रास्ते नगर पंचायत के विकास में कंकरीट बनने का सपना तो देख रहे हैं, लेकिन अब तक रास्तों को मरम्मत का मरहम तक भी नहीं लग पाया है। गांव गांव से कूड़ा उठाने की व्यवस्था कुछ दिन में ही धराशायी हो गई, सवाल उठे तो डपिंग साइट न होने को एक बड़ा कारण बता दिया गया। पेयजल कितनी स्वच्छ व शुद्ध है इस बात का अंदाजा आप आजकल नलों से पानी भरकर खुद देख सकते है। बेशक पेयजल में अभी भी सरकार व विभाग का रोल हो। लेकिन इस खराब जल पर सवाल तो स्थानीय प्रतिनिधि ही उठाएंगे। बैजनाथ व पपरोला दो शहरों को जहां शिव मंदिर, प्रदेश के सबसे बड़ा पंचायती राज संस्थान, बड़े रेलवे जंक्शन, आयुर्वेदिक कॉलेज व जवाहर नवोदय विद्यालय होने के कारण कुछ गर्व हो, लेकिन इन शहरों का हाल मौजूदा दौर में पंचायतों की व्यवस्था के आगे से भी हार गया है। यानी पंचायत के समय में ही यहां जो व्यवस्थाएं थी, वो भी उचित थी।
सवाल यही पैदा होता है कि पिछले ढ़ाई साल के कार्यकाल में यहां हुआ क्या है। छह पार्षदों का गुस्सा भी जायज है। क्योंकि सवालों के तीर सीधे पार्षदों को झेलने पड़ते है। लेकिन व्यवस्था पर यह भी सवाल है कि सभी पार्षद अभी तक कुछ कर क्यों नहीं पाए। छह पार्षदों के अविश्वास पत्र के बाद अब यहां के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की कुर्सी हिलने के संकेत मिलने लगे है। तो अब जोड़ तोड़ की राजनीति भी शुरू हो गई है। अविश्वास पत्र में ही हस्ताक्षर करने वाले एक पार्षद को अब उसके पुराने मामले की फाइल निकालने तक की धमकी सूत्रों के हवाले से मिल रही है। तो अन्य पार्षदों को भी कुछ लोगों द्वारा गुमराह किए जाने की बात कहीं जा रही है।
यानी विकास के समय पर अब यहां कुछ महिने राजनीति भी हवा में रहेगी। और विकास बढ़ नहीं पाएगा फिर विकास विधानसभा चुनाव की आचार संहिता में दब जाएगा। ऐसे में नगर पंचायत के पूरे सिसटम पर ही सवाल उठने लग पड़ा है कि यहां सरकार से लेकर पार्षद अब तक विकास से लेकर व्यवस्थाओं का खाका क्यों तैयार नहीं कर पाए। गांव गांव की पद यात्रा कर रहे विपक्ष की धार क्यों लोगों की आवाज को उठाने में अब तक विफल रही। यहां सवालों के बीच स्थानीय विधायक किशोरी लाल के अच्छे कार्य को भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन्होंने बैजनाथ का पंचायत प्रधान रहते हुए हर वो सुविधा पंचायत में दी जो नगर पंचायत में अब तक नहीं मिल पा रही है और अब भी जब सफाई को लेकर नगर पंचायत हार रही थी, तो विधायक ने ही अपने स्तर पर इसका इंतजाम करवाया।
अगर इस राजनीति को छोड़ दे तो नगर पंचायत की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल दोनों कस्बों में चल रही पंचायतों की दुकानों पर भी उठ रहा है। इन दुकानों में बिना किराये के कई दुकान वर्षों से डटे हुए है। कई दुकानें आगे सबलेट कर दी गई है। अधिकांश दुकानदार अन्य शहरों के है। जबकि यहां का बेरोजगार सड़कों के किनारे रेहड़ी फड़ी लगाकर कैसे रोजगार कमा रहा है, इसे आप मझैरणा रोड से लेकर बैजनाथ तक देख सकते हैं। व्यवस्था पर सवाल यह है कि इन दुकानों को अभी तक नगर पंचायत अपने अधीन कर ही नहीं पाई है। इन दुकानदारों से लाखों की वसूली कौन करेगा, इस पर सब चुप है। ऐसे में विकास की दौड़ में असफल हो रही नगर पंचायत के समक्ष जो हो रहा है। जो पार्षदों का गुस्सा निकला है, वो कहीं न कहीं अब जायज है। यह अलग बात है कि विश्वास व अविश्वास की दौड़ में इन छह पार्षदों का यह निर्णय कब तक टिका रहता है। यह देखने लायक होगा। नगर पंचायत में सरकार के ईनाम के रूप में तीन मनोनीत पार्षद भी है। लेकिन यहां की समस्याएं जस की तस है। वो भी अब तक किसी मसले को लेकर आगे नजर आए नहीं। सवाल अब भी यही है कि नगर पंचायत में विकास शुरू कब होगा। क्योंकि घिरथोली से लेकर पंतेहड़ व बुहली कोठी से लेकर खतरेहड़ तक एक ही सवाल है कि जब व्यवस्था बना नहीं पा रहे, तो फिर विकास के वादों के सहारे चुनाव लड़े भी क्यों?
अगर विकास हुआ है या हो रहा है, तो उसे जाहिर क्यों नहीं किया जा रहा।
अब तो यही शेयर याद आ रहा है, कौन डूबेगा किसे पार उतरना है " ज़फ़र"..... फ़ैसला वक्त के दरिया में उतर कर होगा।
सवाल यही पैदा होता है कि पिछले ढ़ाई साल के कार्यकाल में यहां हुआ क्या है। छह पार्षदों का गुस्सा भी जायज है। क्योंकि सवालों के तीर सीधे पार्षदों को झेलने पड़ते है। लेकिन व्यवस्था पर यह भी सवाल है कि सभी पार्षद अभी तक कुछ कर क्यों नहीं पाए। छह पार्षदों के अविश्वास पत्र के बाद अब यहां के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की कुर्सी हिलने के संकेत मिलने लगे है। तो अब जोड़ तोड़ की राजनीति भी शुरू हो गई है। अविश्वास पत्र में ही हस्ताक्षर करने वाले एक पार्षद को अब उसके पुराने मामले की फाइल निकालने तक की धमकी सूत्रों के हवाले से मिल रही है। तो अन्य पार्षदों को भी कुछ लोगों द्वारा गुमराह किए जाने की बात कहीं जा रही है।
यानी विकास के समय पर अब यहां कुछ महिने राजनीति भी हवा में रहेगी। और विकास बढ़ नहीं पाएगा फिर विकास विधानसभा चुनाव की आचार संहिता में दब जाएगा। ऐसे में नगर पंचायत के पूरे सिसटम पर ही सवाल उठने लग पड़ा है कि यहां सरकार से लेकर पार्षद अब तक विकास से लेकर व्यवस्थाओं का खाका क्यों तैयार नहीं कर पाए। गांव गांव की पद यात्रा कर रहे विपक्ष की धार क्यों लोगों की आवाज को उठाने में अब तक विफल रही। यहां सवालों के बीच स्थानीय विधायक किशोरी लाल के अच्छे कार्य को भी नहीं भूला जाना चाहिए कि उन्होंने बैजनाथ का पंचायत प्रधान रहते हुए हर वो सुविधा पंचायत में दी जो नगर पंचायत में अब तक नहीं मिल पा रही है और अब भी जब सफाई को लेकर नगर पंचायत हार रही थी, तो विधायक ने ही अपने स्तर पर इसका इंतजाम करवाया।
अगर इस राजनीति को छोड़ दे तो नगर पंचायत की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल दोनों कस्बों में चल रही पंचायतों की दुकानों पर भी उठ रहा है। इन दुकानों में बिना किराये के कई दुकान वर्षों से डटे हुए है। कई दुकानें आगे सबलेट कर दी गई है। अधिकांश दुकानदार अन्य शहरों के है। जबकि यहां का बेरोजगार सड़कों के किनारे रेहड़ी फड़ी लगाकर कैसे रोजगार कमा रहा है, इसे आप मझैरणा रोड से लेकर बैजनाथ तक देख सकते हैं। व्यवस्था पर सवाल यह है कि इन दुकानों को अभी तक नगर पंचायत अपने अधीन कर ही नहीं पाई है। इन दुकानदारों से लाखों की वसूली कौन करेगा, इस पर सब चुप है। ऐसे में विकास की दौड़ में असफल हो रही नगर पंचायत के समक्ष जो हो रहा है। जो पार्षदों का गुस्सा निकला है, वो कहीं न कहीं अब जायज है। यह अलग बात है कि विश्वास व अविश्वास की दौड़ में इन छह पार्षदों का यह निर्णय कब तक टिका रहता है। यह देखने लायक होगा। नगर पंचायत में सरकार के ईनाम के रूप में तीन मनोनीत पार्षद भी है। लेकिन यहां की समस्याएं जस की तस है। वो भी अब तक किसी मसले को लेकर आगे नजर आए नहीं। सवाल अब भी यही है कि नगर पंचायत में विकास शुरू कब होगा। क्योंकि घिरथोली से लेकर पंतेहड़ व बुहली कोठी से लेकर खतरेहड़ तक एक ही सवाल है कि जब व्यवस्था बना नहीं पा रहे, तो फिर विकास के वादों के सहारे चुनाव लड़े भी क्यों?
अगर विकास हुआ है या हो रहा है, तो उसे जाहिर क्यों नहीं किया जा रहा।
अब तो यही शेयर याद आ रहा है, कौन डूबेगा किसे पार उतरना है " ज़फ़र"..... फ़ैसला वक्त के दरिया में उतर कर होगा।

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