Friday, 28 July 2017

31 जुलाई की उस रात को याद कर आज भी सिहर उठता है बैजनाथ

31 जुलाई 2001 की रात। बारिश का दौर लगातार बढ़ता जा रहा था। आसमानी बिजली हर किसी को डरा रही थी। मैं बारिश के कारण बैजनाथ फंसा हुआ था। रात करीब साढ़े 11 बजे मैंने वहां अपने एक मित्र से स्कूटर लेकर बारिश में ही घर निकलने का निर्णय लिया। धीमी सी स्कूटर की लाइट और आगे गिरते पत्थर बेहद खौफनाक मंजर पेश कर रहे थे। खीर गंगा मोड़ के पास पहुंचा तो बिनवा का रूख बेहद अशांत लग रहा था। बिनवा उस दिन अजीब सी आवाज में बह रही थी। बरसात है, इस कारण पानी बढ़ा होगा ऐसे में ध्यान नहीं दिया। लेकिन जैसे ही बिनवा पुल के पास पहुंचा, तो ठीक पुल के नीचे श्मशान घाट वाली साइड में बिनवा के बिल्कुल किनारे पर उस समय बनी झोल भट्ठी में लगे बल्ब की रोशनी से बिनवा में भी कुछ रोशनी पड़ रही थी। स्कूटर किनारे खड़ा कर पुल से ही बिनवा को देखने की उत्सुकता जगी। उस समय एक कार भी वहां रूकी। नीचे देखा तो बिनवा का मंजर भयानक था। कुछ मिनट बाद भयंकर आवाज आना शुरू हुई, आवाज को सुनकर झोल भट्ठी से भी कुछ लोग बाहर निकले। पानी एकाएक बढऩे लगा, आवाज बेहद तेज हो चली। कुछ ही पलों में सामने नजारा बेहद भयानक था। कई फुट ऊंची पानी की लहर आगे बढ़ रही थी, उसके साथ पत्थरों से लेकर पेड़ों का एक सैलाब बहकर आ रहा था। पुल को छोड़कर मैंने ओर कार में मौजूद लोग भी वहां से तुरंत भागे। आवाज को सुनकर कई वाहन वहां खड़े हो गए थे।

रोशनी थी नहीं लेकिन आसमानी बिजली की धार में बिनवा के विकराल रूप को साफ देखा जा रहा था। उस सैलाब से बेहद गंदी बदबू आ रही थी। जैसे ही वो बिनवा में आया वो सैलाब बिनवा पुल के पास पहुंचा, तो एक अजीब सी धरती में कंपन होने लगी। झोल भट्ठी में लगा बल्ब गायब हो चुका था। ऐसा लग रहा था कि बिनवा यह पुल भी बह कर ले जाएगी। वहां उस आवाज को देखकर करीब 10-15 वाहन भी रूक गए थे। लोग नीचे देखने का प्रयास कर रहे थे। करीब एक घंटे तक वो ही मंजर रहा। पुल से कुछ वाहन गुजरते रहे। उस दौर में न मोबाइल थे और न ही डिजीटल का कोई दौर की इस नजारे को किसी न किसी ढंग से कैद करते। कुछ शक तो हो रहा था कि कुछ न कुछ गड़बड़ उपर हुई है। इसके बाद घर पहुंचा। कुछ नींद आई, तो वो सारा मंजर सपने की तरह लग रहा था। सुबह पांच बजे उठकर मंद सी रोशनी में मैं उतराला सड़क की तरफ पहुंचा कि नीचे देखता हूं कि रात को हुआ क्या था। चूंकि उस समय मैं पत्रकारिता में प्रवेश कर चुका था, ऐसे में जानने की उत्सुकता भी काफी थी। जैसे ही उतराला रोड में पहुंचा तो नीचे का मंजर बेहद भयानक था। बिनवा की धारा अब भी काले रंग के पानी के साथ तेज था। खीर गंगा घाट गायब हो चुका था। पैदल ही बिनवा पुल के पास पहुंचा, तो लोग वहां पहुंच चुके थे। झोल भट्ठी का कुछ मलबा ही बचा था। बिनवा के बस व रेल पुल के बीच बने पुराने पुल के नीचे लगे लोहे की रेलिंग में कूड़ा व कुछ लकडिय़ां फंसी थी। जो खुद बयां कर रही थी कि पानी का रात को लेबल कितना था। खीर गंगा घाट के पास से बिनवा अपना मार्ग बदल चुकी थी। यहां बने टापू के दूसरी तरफ केवल रेत का ही एक बड़ा मैदान था। कुछ देर बाद पता चला कि रात को धौलाधार में बादल फटा है और बिनवा व लुनी खड्डों के कैचमैंट एरिया से यह सारा पानी नीचे पहुंचा है। फिर पूरे नुकसान की रपट बनाने के लिए मैं और मेरे साथी पत्रकार श्री अश्वनी सूद जी एक छोटे से स्कूटर में बाढ़ की रपट करने के लिए दियोल की तरफ निकल पड़े। दियोल को जोडऩे वाला मुख्य पुल बह चुका था। वहां मंजर बेहद भयानक था। एक छोटे से नाले के रूप में बहने वाली लुनी खड्ड के ताडंव की तस्वीर सामने दिख रही थी। दियोल को जाने का कोई रास्ता नहीं था।

हम फिर वापस लौटे और पपरोला से उतराला की तरफ निकले। बारिश अब भी नहीं थम रही थी।  उतराला के बिनवा नगर में जैसे ही पहुंचे, तो वहां की बिनवा नगर की कालोनी की तस्वीर भी बिगड़ चुकी थी। बिनवा के किनारे के कुछ मकान व गोदाम बह चुके थे, तो कुछ अधर में लटके हुए थे। पावर हाउस सिल्ट के कारण बंद हो चुका था। उस समय के पावर हाउस के कुछ अधिकारी नुकसान की जानकारी लेने के लिए पावर हाउस के बांध व पर्रई के पास जहां से पानी मोड़ा गया है। वहां जा रहे थे। तो उसने जानकारी पता चली कि उनके एक कर्मचारी केहर सिंह लापता हो गया है। पहली उनकी ही टीम वहां जा रही है। हम भी उनके साथ निकले, तो करीब सात किलोमीटर पैदल चलकर जब बिनू व परई के संगम स्थान, जहां से बिनवा बनती है पहुंचे तो नजारा बेहद खौफनाक था। दोनों नालों के बीच बना कंट्रोल रूम गायब था। वहां कुछ नहीं बचा था। बिनवा प्रोजेक्ट के डैम को यहां से जानी वाली सुरंग का गेट बंद था। फिर पता चला कि रात को केहर सिंह ने नीचे कंट्रोल रूम में सूचना दी थी कि यहां पानी बढ़ रहा है और वह सुरंग का गेट बंद कर रहा है। उसके बाद फोन का संपर्क कट गया था। शाम तक पता चला कि यह एक बड़ी त्रासदी यहां हुई है और इससे यहां संपत्ति को नहीं बल्कि काफी जानी नुकसान भी हुआ है। उस समय आंकड़ों के अनुसार यहां दस के करीब लोगों के मारे जाने की सूचना थी जबकि सैकड़ों पशु बह गए थे। जालसू जोत्त में भी काफी नुकसान हुआ था। लेकिन वहां कितने लोग मरे थे, उसका आंकड़ा नहीं मिल पाया था। उस त्रासदी के जख्म भले ही अब भरे हो, लेकिन जिन लोगों ने भी उस मंजर को देखा था, वो आज भी उस मंजर को देखकर सहम उठते। आज भी उस पूरी घाटी में मरघट सी एक खामोशी है। उतराला बैल्ट पर प्रकृति अब तक शांत है। लेकिन दियोल की तरफ इस घटना की ठीक दो साल बाद फिर से लुलाणी गांव में बादल फटा था। इससे वहां पांच लोगों की मौत हो गई थी। वो गांव अब भी अपनी कहानी बयां करता है। भले ही यह बातें अब इतिहास बन रही हो, लेकिन भविष्य के लिए यह घटनाएं कई सवाल खड़े कर गई है।

-मुनीष दीक्षित।

Sunday, 16 July 2017

विकास के वादे के आगे हार गई बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत

बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत के छह पार्षदों ने अपने ही अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जनता के समक्ष विकास के झूठे वादों से हार रहे इन पार्षदों ने खुद आगे आकर अपनी सही तस्वीर बताने का प्रयास किया है कि विकास हो नहीं रहा और जो कहीं हो रहा है, उन बारे वह नहीं जानते। वर्ष 2014 से विरोध के बीच शुरू हुई बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत में अंतिम सहमति लोगों ने इस कारण बनाई थी कि विकास की बढ़त में यह जरूरी है और सुविधाएं भी उन्हें मिलेगी। उस समय यहां की 10 हजार से अधिक की आबादी को सफाई से लेकर स्वच्छ पेयजल, पक्के रास्तों से लेकर स्ट्रीट लाइट व दोनों शहरों में पार्किंग से लेकर बेहतरीन सफाई व्यवस्था के बड़े बड़े सब्जबाग दिखाए गए थे। इन्हीं उम्मीदों के आसरे कुछ विरोध के बाद सभी 11 वार्डों के लोगों ने अपना समर्थन नगर पंचायत को दिया। उम्मीद विकास की थी, लेकिन यह उम्मीद आज तीन साल के कार्यकाल की तरफ बढ़ रही नगर पंचायत पूरी ही नहीं करवा पाई है। अब स्ट्रीट लाइट के सहारे यहां के लोगों को विकास की कुछ रोशनी दिखाने का प्रयास तो किया जा रहा है। लेकिन सफाई व्यवस्था में नगर पंचायत इस कदर पिट चुकी है कि यह रोशनी कुछ नहीं कर पा रही है। सभी वार्डों के टूटे रास्ते नगर पंचायत के विकास में कंकरीट बनने का सपना तो देख रहे हैं, लेकिन अब तक रास्तों को मरम्मत का मरहम तक भी नहीं लग पाया है। गांव गांव से कूड़ा उठाने की व्यवस्था कुछ दिन में ही धराशायी हो गई, सवाल उठे तो डपिंग साइट न होने को एक बड़ा कारण बता दिया गया। पेयजल क‍ितनी स्‍वच्‍छ व शुद्ध है इस बात का अंदाजा आप आजकल नलों से पानी भरकर खुद देख सकते है। बेशक पेयजल में अभी भी सरकार व व‍िभाग का रोल हो। लेकिन इस खराब जल पर सवाल तो स्‍थानीय प्रत‍िन‍िध‍ि ही उठाएंगे। बैजनाथ व पपरोला दो शहरों को जहां शिव मंदिर, प्रदेश के सबसे बड़ा पंचायती राज संस्थान, बड़े रेलवे जंक्शन, आयुर्वेदिक कॉलेज व जवाहर नवोदय विद्यालय होने के कारण कुछ गर्व हो, लेकिन इन शहरों का हाल मौजूदा दौर में पंचायतों की व्यवस्था के आगे से भी हार गया है। यानी पंचायत के समय में ही यहां जो व्‍यवस्‍थाएं थी, वो भी उच‍ित थी।
सवाल यही पैदा होता है कि पिछले ढ़ाई साल के कार्यकाल में यहां हुआ क्या है। छह पार्षदों का गुस्सा भी जायज है। क्योंकि सवालों के तीर सीधे पार्षदों को झेलने पड़ते है। लेकिन व्‍यवस्‍था पर यह भी सवाल है क‍ि सभी पार्षद अभी तक कुछ कर क्‍यों नहीं पाए। छह पार्षदों के अविश्वास पत्र के बाद अब यहां के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की कुर्सी हिलने के संकेत मिलने लगे है। तो अब जोड़ तोड़ की राजनीत‍ि भी शुरू हो गई है। अविश्वास पत्र में ही हस्ताक्षर करने वाले एक पार्षद को अब उसके पुराने मामले की फाइल निकालने तक की धमकी सूत्रों के हवाले से म‍िल रही है। तो अन्‍य पार्षदों को भी कुछ लोगों द्वारा गुमराह क‍िए जाने की बात कहीं जा रही है।
यानी व‍िकास के समय पर अब यहां कुछ मह‍िने राजनीत‍ि भी हवा में रहेगी। और व‍िकास बढ़ नहीं पाएगा फ‍िर व‍िकास व‍िधानसभा चुनाव की आचार संह‍िता में दब जाएगा। ऐसे में नगर पंचायत के पूरे स‍िसटम पर ही सवाल उठने लग पड़ा है क‍ि यहां सरकार से लेकर पार्षद अब तक व‍िकास से लेकर व्‍यवस्‍थाओं का खाका क्‍यों तैयार नहीं कर पाए। गांव गांव की पद यात्रा कर रहे व‍‍िपक्ष की धार क्‍यों लोगों की आवाज को उठाने में अब तक व‍िफल रही। यहां सवालों के बीच स्‍थानीय विधायक क‍िशोरी लाल के अच्‍छे कार्य को भी नहीं भूला जाना चाह‍िए कि उन्‍होंने बैजनाथ का पंचायत प्रधान रहते हुए हर वो सुविधा पंचायत में दी जो नगर पंचायत में अब तक नहीं म‍िल पा रही है और अब भी जब सफाई को लेकर नगर पंचायत हार रही थी, तो व‍िधायक ने ही अपने स्‍तर पर इसका इंतजाम करवाया।
 अगर इस राजनीति को छोड़ दे तो नगर पंचायत की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल दोनों कस्बों में चल रही पंचायतों की दुकानों पर भी उठ रहा है। इन दुकानों में बिना किराये के कई दुकान वर्षों से डटे हुए है। कई दुकानें आगे सबलेट कर दी गई है। अधिकांश दुकानदार अन्य शहरों के है। जबकि यहां का बेरोजगार सड़कों के किनारे रेहड़ी फड़ी लगाकर कैसे रोजगार कमा रहा है, इसे आप मझैरणा रोड से लेकर बैजनाथ तक देख सकते हैं। व्यवस्था पर सवाल यह है कि इन दुकानों को अभी तक नगर पंचायत अपने अधीन कर ही नहीं पाई है। इन दुकानदारों से लाखों की वसूली कौन करेगा, इस पर सब चुप है। ऐसे में विकास की दौड़ में असफल हो रही नगर पंचायत के समक्ष जो हो रहा है। जो पार्षदों का गुस्सा निकला है, वो कहीं न कहीं अब जायज है। यह अलग बात है कि विश्वास व अविश्वास की दौड़ में इन छह पार्षदों का यह निर्णय कब तक टिका रहता है। यह देखने लायक होगा। नगर पंचायत में सरकार के ईनाम के रूप में तीन मनोनीत पार्षद भी है। लेकिन यहां की समस्याएं जस की तस है। वो भी अब तक क‍िसी मसले को लेकर आगे नजर आए नहीं। सवाल अब भी यही है कि नगर पंचायत में विकास शुरू कब होगा। क्योंकि घिरथोली से लेकर पंतेहड़ व बुहली कोठी से लेकर खतरेहड़ तक एक ही सवाल है कि जब व्यवस्था बना नहीं पा रहे, तो फिर विकास के वादों के सहारे चुनाव लड़े भी क्यों?
अगर व‍िकास हुआ है या हो रहा है, तो उसे जाहिर क्‍यों नहीं क‍िया जा रहा।

अब तो यही शेयर याद आ रहा है, कौन डूबेगा किसे पार उतरना है " ज़फ़र"..... फ़ैसला वक्त के दरिया में उतर कर होगा।

Sunday, 2 July 2017

बैजनाथ में आसान नहीं भाजपा की राह

एक दशक से ज्यादा समय से बैजनाथ में अपनी खोई हुई जीत को वापस पाने के लिए भाजपा बेशक उत्सुक है। लेकिन इस बार भी यहां भाजपा की राह आसान नजर नहीं आती। पिछले चुनाव में पुर्नसीमांकन के कारण उम्मीदवार से लेकर राजनीतिक हलके की बदली सीमा के कारण यहां भाजपा कई सालों से बैजनाथ की सियासत में छाए किशोरी लाल के सामने नहीं टिक पाई थी। पिछले चार वर्षो पर नजर डाले तो बैजनाथ में भाजपा मजबूत हुई है। लोकसभा चुनाव में कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में सबसे अधिक लीड भाजपा उम्मीदवार को बैजनाथ से ही मिली थी। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही भाजपा के लिए यहां वही राह बनना शुरू हो गई है, जिसे वर्ष 2007 में भाजपा यहां झेल चुकी है। यानी सफलता की राह की तरफ बढ़ते कदमों को रोकने के लिए भाजपा के ही यहां कई गुट तैयार हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दम पर यहां हर कोई भाजपा की टिकट का दावा ठोक रहा है। ताकि मोदी लहर में ही सही उनकी किश्ती इस सफलता को आसानी से पार कर लें। ऐसे में भाजपा भले ही जिसे भी टिकट दें, उसके लिए कांग्रेस से अधिक कांटे बोने के लिए भाजपा के ही लोग तैयार बैठ गए हैं। इसकी शुरूआत अलग अलग ढंग से लोगों को एकत्रित कर बैठकों के जरिए अपना जनाधार साबित करने से भी हो गई है। तो भाजपा के ही कुछ नेता यहां टिकट के दावेदारों को अपने अधीन कर आगे कर इस पूरी पाली को ही अपने पक्ष में करने की फिराक में लग गए है। वर्ष 2007 में भी भाजपा के यहां से उम्मीदवार दूलो राम के गणित को भाजपा के ही कुछ कार्यकर्ताओं ने बिगाड़ा था। साथ ही उस समय भाजपा के ही कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा चुनाव संग्राम से पहले ही आम लोगों पर अपनी भविष्य की ताकत की धौंस भी महंगी पड़ गई थी। इस बार कुछ ऐसे ही गणित बनने लगा है। इस चुनाव में भाजपा मंडल का एक पुराना धड़ा भी भाजपा की राह को कठिन बना सकता है। क्योंकि इस धड़े के पदाधिकारियों को जिस ढंग से पार्टी व पदों से रुख्सत किया गया था। वो कहीं न कहीं रंज के रूप में सामने आएगा ही। इस समय भाजपा में उम्मीदवारों की फेहरिस्त भी लंबी हो चली है। इनमें पिछले चुनाव में 16 हजार मत लेकर दूसरे नंबर पर रहे मुल्ख राज प्रेमी प्रबल दावेदार है। तो बीड़ पंचायत से महिला नेत्री एवं महिला आयोग की पूर्व सदस्य शीला देवी भी इस दौड़ में आगे आ गई है। पिछले चुनाव में कांग्रेस से खफा जिला परिषद सदस्य तिलक राज भी इस चुनाव में भाजपा की टिकट के दावेदारों में एक है। तिलक राज ने न केवल भाजपा में पकड़ बनाई है, बल्कि भाजपा से संबंधित कई अन्य संगठनों के कार्यों में भी तिलक आगे हैं। इसके अलावा भी कई नाम आगे आ रहे है। टिकट मिले तब मिले, लेकिन चुनाव से पहले ही इन नेताओं के अलग अलग कार्यक्रम जहां जनता में चर्चा बने हुए है। वहीं, कांग्रेस के मौजूदा विधायक किशोरी लाल अपनी ही चाल से दूसरी पारी की तैयारी में है। 35 साल तक बैजनाथ पंचायत की प्रधानी कर चुके किशोरी लाल वर्ष 2012 में यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए थे। उस समय किशोरी लाल के सामने भी वही चुनौतियां थी, जो भाजपा वर्ष 2007 तथा अब झेलने जा रही है। लेकिन पं संत राम के समय से ही अपनी पकड़ बना चुके तथा बैजनाथ में प्रधान होने के साथ साथ क्षेत्र के सभी लोगों की समस्‍याओं का यहां के कार्यालयों में समाधान करवाने के कारण बनी अपनी पकड़ से किशोरी लाल ने अपनी नाव पार लगा ली थी। इस बार किशोरी लाल के सामने अभी कोई उम्मीदवार भी उस ढंग से नहीं कूदा है, जिस ढंग से भाजपा में शुरूआत हुई है। ऐसे में भाजपा की आसान होती राह, अब कठिन डगर पर पहुंच गई है। अब बैजनाथ भाजपा के तीन वरिष्ठ नेताओं की आपसी सहमति ही इस डगर को आसान बना सकती है। साथ ही चुनाव से पहले अगर छ‍िटक रही भाजपा एक न हुई तो शायद इत‍िहास फ‍िर वापस आ सकता है और फ‍िर से बैजनाथ कांग्रेस के दुर्ग की ही संज्ञा बरकरार रख सकता है।

ऐसी तालीम पाई, कर रहे छितकुल की भलाई

कुछ दिन पहले छितकुल जाना हुआ। चीन-तिब्बत की सीमा में किन्नौर जिला में सांगला वैली का अंतिम गांव, छितकुल को भारत का आखिरी गांव भी कहा जाता ...