दरकता पहाड़ और उजाड़ कोटरोपी। 46 लोगों की मौत के बाद कोटरोपी का मलबा अब शांत हो गया है। लेकिन हादसे के बाद अब भी दो लोग लापता हैं। यह हादसा कई परिवारों को ऐसे जख्म दे गया है, जिसकी भरपाई शायद कभी न हो सके। देवभूमि की वादियों में घूमने आ रहे उत्तर प्रदेश के चार परिवारों को तो यह हादसा पूरी तरह से लील गया। लेकिन इस सच से इतर एक दूसरा खौफनाक सच अब भी त्रासदी की चादर में लिपटा हुआ है। क्योंकि यह न तो पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले लोग थे और न ही इन्हें कहीं जाना था। यह पर्यटक भी नहीं है जो खुली आबो-हवा में जिंदगी तर कर कुछ समय बाद लौट जाएंगे। इनका सच ही इनकी त्रासदी है, इन्हें कहीं लौटना नहीं है। यह लोग है हिमाचल के मंडी जिला के कोटरोपी सहित आसपास के कई गांवों के। जहां इस भूस्खलन ने इन्हें पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है। तो जोगेंद्रनगर से लेकर मंडी तक 50 किलोमीटर लंबे एनएच के किनारे बसे कई गांवों के लोगों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब यहां के पहाड़ शांत नहीं है। यह सारा हिस्सा एक पहाड़ के नीचे से होकर ही गुजरता है। सबसे अधिक त्रासदी यहां के पांच गांवों बड़वाहण, कोटरोपी, सराजबादला व दो अन्य की है। जहां घर तो सुरक्षित है, लेकिन कब पहाड़ फिर गुस्से में उन्हें तबाह कर दे कोई नहीं जानता। यहां के सैकड़ों लोगों के सामने संकट यह है कि पहाड़ के टूट कर गिरने के बाद जिदंगी जीने का हर रास्ता बंद होने लगा है। यहां की जमीन का एक बड़ा हिस्सा मलबे से भर चुका है। यानी खेत खलिहान मिट्टी और पानी के साथ भी बंजर हो गए है। तो जिदंगी अस्थायी ठिकानों में कट रही है। स्थायी ठिकाने तो हैं लेकिन उसके उपर पहाड़ की दशहत है। यानी उन घरों में अब कोई रहने का रिस्क उठाना नहीं चाहता।
यानी पहाड़ का जीवन पहले से ही संघर्ष के आसरे चलता है उसपर गुस्साए पहाड़ ने इस संघर्ष को और बढ़ा दिया है। इन गांवों का सुकून वाला पल एक ही है कि इस बड़ी त्रासदी में एक भी घर में कोई नुकसान या अनहोनी नहीं हुई। पहाड़ का गुस्सा आधी रात को उसकी छाती से होकर गुजरने वाले एनएच से जा रही दो बसों, बाइकों व कारों पर तो फूटा, लेकिन निकट बसे घरों को आंशिक नुकसान पहुंचाने तक ही सिमट गया। यह पहला हादसा है, जब चलती बसों पर पहाड़ फूटा हो और चंद सेकेंड में बसों का नामोनिशान मिट गया हो। इस हादसे ने कई सवाल पैदा कर दिए हैं। बादल फटने से लेकर अब तक बस हादसों से दहल रहे हिमाचल में अब यह नया खौफ आ गया है। हिमाचल का दर्द यह है कि ऐसे हादसों से निपटने के लिए कुछ हो भी नहीं सकता है, क्योंकि हिमाचल की 90 प्रतिशत सड़के पहाड़ की छाती से होकर गुजरती है और कौन पहाड़ कमजोर हैं और कौन कब गिरने वाला है, ऐसी प्रणाली को अभी इसरो भी विकसित नहीं कर सका है, तो सरकार क्या कर पाएगी। अब पहाड़ का गुस्सा झेलने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। लेकिन एक बात जरूर है कि पहाड़ गुस्से में तब आने लगे है, जब सुरंगों के जाल से लेकर सीमेंट फैक्टरी, बांधों के पानी के लिए सुरंगों खोदने व पहाड़ों में सड़कों के जाल बिछाने का ग्राफ बढ़ा दिया गया है।
हादसे की रेंज से ही चंद किमी पीछे गुम्मा में भी चट्टानी नमक के लिए बिछे सुरंगों के जाल को पहाड़ ने इस कदर मिटा डाला था कि आज तक न सुरंगों का नमोनिशां मिला है और न ही उस इलाके का। हिमाचल में प्रकृति का तांडव दो दशक से ही शुरू हुआ है, जो कहीं न कहीं यह संकेत जरूर दे रहा है कि प्रकृति से इंसान की छेड़छाड़ बढ़ेगी तो पहाड़ से लेकर नदियां भी उसका पूरा जबाव देंगी। अब देखना सरकार को ही नहीं बल्कि यहां की जनता को भी कौन से कदम उनके हित में हैं और कौन से नहीं। प्रकृति को विनाश के गर्त में ले जाने वाले प्रोजेक्टों को एनओसी देने से पहले पंचायतों को भी गंभीर होना होगा और गांव के विकास के लिए चंद
सिक्कों के लालच की बजाए भविष्य को दांव में लगाने से बचना होगा।
यानी पहाड़ का जीवन पहले से ही संघर्ष के आसरे चलता है उसपर गुस्साए पहाड़ ने इस संघर्ष को और बढ़ा दिया है। इन गांवों का सुकून वाला पल एक ही है कि इस बड़ी त्रासदी में एक भी घर में कोई नुकसान या अनहोनी नहीं हुई। पहाड़ का गुस्सा आधी रात को उसकी छाती से होकर गुजरने वाले एनएच से जा रही दो बसों, बाइकों व कारों पर तो फूटा, लेकिन निकट बसे घरों को आंशिक नुकसान पहुंचाने तक ही सिमट गया। यह पहला हादसा है, जब चलती बसों पर पहाड़ फूटा हो और चंद सेकेंड में बसों का नामोनिशान मिट गया हो। इस हादसे ने कई सवाल पैदा कर दिए हैं। बादल फटने से लेकर अब तक बस हादसों से दहल रहे हिमाचल में अब यह नया खौफ आ गया है। हिमाचल का दर्द यह है कि ऐसे हादसों से निपटने के लिए कुछ हो भी नहीं सकता है, क्योंकि हिमाचल की 90 प्रतिशत सड़के पहाड़ की छाती से होकर गुजरती है और कौन पहाड़ कमजोर हैं और कौन कब गिरने वाला है, ऐसी प्रणाली को अभी इसरो भी विकसित नहीं कर सका है, तो सरकार क्या कर पाएगी। अब पहाड़ का गुस्सा झेलने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। लेकिन एक बात जरूर है कि पहाड़ गुस्से में तब आने लगे है, जब सुरंगों के जाल से लेकर सीमेंट फैक्टरी, बांधों के पानी के लिए सुरंगों खोदने व पहाड़ों में सड़कों के जाल बिछाने का ग्राफ बढ़ा दिया गया है।
हादसे की रेंज से ही चंद किमी पीछे गुम्मा में भी चट्टानी नमक के लिए बिछे सुरंगों के जाल को पहाड़ ने इस कदर मिटा डाला था कि आज तक न सुरंगों का नमोनिशां मिला है और न ही उस इलाके का। हिमाचल में प्रकृति का तांडव दो दशक से ही शुरू हुआ है, जो कहीं न कहीं यह संकेत जरूर दे रहा है कि प्रकृति से इंसान की छेड़छाड़ बढ़ेगी तो पहाड़ से लेकर नदियां भी उसका पूरा जबाव देंगी। अब देखना सरकार को ही नहीं बल्कि यहां की जनता को भी कौन से कदम उनके हित में हैं और कौन से नहीं। प्रकृति को विनाश के गर्त में ले जाने वाले प्रोजेक्टों को एनओसी देने से पहले पंचायतों को भी गंभीर होना होगा और गांव के विकास के लिए चंद
सिक्कों के लालच की बजाए भविष्य को दांव में लगाने से बचना होगा।





