Saturday, 19 December 2020

ऐसी तालीम पाई, कर रहे छितकुल की भलाई




कुछ दिन पहले छितकुल जाना हुआ। चीन-तिब्बत की सीमा में किन्नौर जिला में सांगला वैली का अंतिम गांव, छितकुल को भारत का आखिरी गांव भी कहा जाता है। क्योंकि इस गांव के आगे केवल अंतराष्ट्रीय सीमा है। यहां के लोग अच्छे ही नहीं बल्कि बहुत अच्छे हैं। अतिथि सत्कार की बात हो या फिर पर्यावरण की यहां के लोग काफी जागरूक है। छितकुल में मुलाकात हुई भाई अरविंद नेगी जी से, हंसमुख प्रतिभा के धनी अरविंद जी छितकुल के उपप्रधान हैं। गांव में पर्यावरण की बात हो या फिर पंचायत में लोगों की समस्या के समाधान की अरविंद जी हमेशा आगे रहने वालों में से एक हैं। बातों बातों में ही पता चला कि अरविंद जी कार्मिक प्रबंधन में स्नातकोत्तर हैं और बीएड भी हैं।


ऐसी दुरुह परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी शिक्षा को पूरा किया और कहीं नौकरी की बजाए अपनी पंचायत अपने गांव में जनसेवा को अपनाया। अरविंद जी वर्ष 2016 से इस पंचायत के उपप्रधान हैं। पंचायत को लेकर बात हुई, तो इतना ही कहा कि छितकुल मेरे लिए कर्मभूमि, जन्मभूमि सब कुछ है। यहां का पर्यावरण अच्छा रहे, गांव के लोगों तक सरकार की योजनाएं पहुंचे। यहां के लोगों को सभी सुविधाएं मिले, इसके लिए वह हमेशा तत्पर रहते हैं। यह सब यहां के गांवों के लोगों व उनके सहयोगियों के कारण ही संभव हो पाता है। गांव में पर्यटक पहुंचते हैं, ऐसे में यहां के कूड़े कचरे का वैज्ञानिक ढंग से निष्पादन हो पाए, इसके लिए भी अरविंद ने हमेशा पहल की है। 



बस्पा नदी के किनारे बसी यह खूबसूरत घाटी सभी के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। यहां की खूबसूरती सभी लुभाती है। अरविंद कहते हैं कि यहां पर्यटन के क्षेत्र में भी काफी कुछ करना बाकि है। यह गांव एक सुंदर ढंग से विकसित हो, यहां पर्यटन से पंचायत के युवाओं को रोजगार मिले। यही उनका प्रयास है। मुझे अच्छा लगा कि ऐसे अंतिम छोर के गांव में भी ऐसे प्रतिनिधि है, जो अपने गांव अपने लोगों के बारे में सोच रखते हैं, पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ बोलते हैं। सांगला वैली में छितकुल तक काफी लोगों से मुलाकात हुई, यहां के लोग बहुत ही अच्छे हैं। यहां के पंचायत प्रतिनिधि भी एक अच्छी व सकरात्मक सोच रखने वाले हैं। इस घाटी व यहां के लोगों को मेरा नमन।

Wednesday, 16 September 2020

पर्यटकों के लिए खुल गया हिमाचल, अब आराम से लिजिए घूमने का आनंद


यदि आप लॉकडाउन के दौरान घर बैठे बोर हो गए हैं। तो हिमाचल के पहाड़ आपको प्रकृति के बीच घूमने का आनंद दे सकते हैं। हिमाचल सरकार ने पर्यटकों के लिए भी हिमाचल के द्वार खोल दिए हैं। अब कोई भी पर्यटक हिमाचल में आ सकता है। यहां आराम से घूम सकता है। पहले सरकार की तरफ से पांच दिन और उसके बाद दो दिन की होटल बुकिंग के साथ साथ कोरोना की रिपोर्ट अनिवार्य की गई थी। मगर अब 16 सितंबर से हिमाचल में पर्यटकों को ऐसी कोई बाध्यता नहीं होगी। इस बारे सरकार की जल्द अधिसूचना जारी होने वाली है। इसके बाद आपको हिमाचल आने जाने में कोई परेशानी नहीं होगी। 



हिमाचल सरकार ने केंद्र सरकार की कोरोना को लेकर जारी गाइडलाइन्स के अनुसार कार्य शुरू कर दिया है। अब बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए कोई पंजीकरण या रिपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर्यटकों को देखते हुए हिमाचल के अधिकांश हिस्सों में होटल व अन्य एडवेंचर एक्टविटी भी शुरू हो गई है। बीड़-बिलिंग में 16 सितंबर से पैराग्लाइडिंग शुरू हो गई है। साथ ही ट्रैकिंग व कैपिंग का भी आप धर्मशाला, मनाली या बीड़ बिलिंग में आनंद ले सकते हैं। पर्यटन व्यवसायियों के लिए पर्यटन विभाग ने एसओपी जारी की है। इसके अनुसार ही उन्हें पर्यटकों के लिए व्यवस्था करनी होगी।




ऐसे में यदि आप हिमाचल घूमने का कार्यक्रम बना रहे हैं। तो आप यहां आ सकते हैं। लेकिन यहां आने के लिए आपको टैक्सी या अपनी गाड़ी में ही आना होगा। अभी हिमाचल सरकार ने बाहरी राज्यों से बस सेवा को शुरू नहीं किया है और न ही ट्रेन सेवा उपलब्ध है। अभी केवल बाहर से आने के लिए हवाई सेवा ही उपलब्ध है। इसमें दिल्ली से धर्मशाला एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट आ रही है। यदि आप हिमाचल रहे हैं। तो इस दौरान शुरूआती दिनों में मुख्य पर्यटन स्थलों की ही सैर करें। क्योंकि अभी कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों ने खुद अपने गांवों में प्रवेश होटल आदि बंद किए हुए हैं। ऐसे में हिमाचल आने से पहले अपनी होटल बुकिंग कंफर्म कर लें। ताकि आपको कोई परेशानी हो। 



मनाली के पर्यटन व्यवसाय से जुड़े रणवीर राणा बताते हैं कि हिमाचल की अर्थव्यस्था और अधिकतर लोगों का रोजगार पर्यटन से जुड़ा है। ऐसे में हिमाचल में अब पर्यटकों के लिए कोई बंदिहोने से पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। कई लोगों को फिर से रोजगार होगा। मैक्लोडगंज भागसूनाग के होटल राजा पैलेस के एमडी विकास नैहरिया कहते हैं कि यहां के अधिकतर होटल पर्यटकों के लिए तैयार हैं। वहीं मनु एडवेंचर के एमडी मनु बताते हैं कि ट्रैकिंग के लिए बुकिंग आना शुरू हो गई है। काफी पर्यटक यहां आने की योजना बना रहे हैं। 



Friday, 11 September 2020

खत्म हुआ इंतजार, आप भी भरिए इस खूबसूरत स्थान में आसमा की उड़ान

कोरोना के कारण आप भी घरों में लंबे समय से कैद होंगे। घूमने की आजादी केवल बाजार में जरूरतों के सामान लेने के अलावा आफिस तक सिमट गई है। ऐसे में यदि आप कुछ पल सुकून के बिताना चाहते हैं। तो आपके लिए हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत बीड़-बिलिंग घाटी एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है। मानसून की फुहारों के बीच बीड़-बिलिंग घाटी में आजकल हरी वादियां और पहाड़ों के बीच में तैरते बादल एक खूबसूरत नजारा पेश कर रहे हैं। आपको मालूम होगा कि यह घाटी क्यों पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यदि आपको जानकारी नहीं है, तो आपको बताना चाहूंगा कि यह घाटी हवावाजी के खेल यानी पैराग्लाइडिंग के पूरी दुनिया में मशहूर है। देश की राजधानी दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर की दूरी पर यह घाटी हिमाचल के खूबसूरत स्थानों में से एक है। इस घाटी की पहचान अब एडवेंचर हब के रूप में होने लगी है। 


बीड़ लैडिंग साइट

16 सितंबर से शुरू हो जाएगी पैराग्लाइडिंग

बीड़-बिलिंग घाटी में सबसे अधिक पर्यटक पैराग्लाइडिंग के लिए पहुंचते हैं। कोरोना के कारण इस घाटी में पर्यटन गतिविधियां व पैराग्लाइडिंग मार्च महीने से बंद है। सरकार ने यहां अब पैराग्लाइडिंग की अनुमति दे दी है। इसके अलावा यहां अब होटल, गेस्ट हाउस व रेस्तरां भी खुलने लगे हैं। हिमाचल के कई हिस्सों से यहां पर्यटक पहुंच रहे हैं। अन्य राज्यों से आने वाले पर्यटकों के लिए भी हिमाचल सरकार ने अभी कुछ शर्तों पर एंट्री रखी है। उन्हें पूरा कर बाहर से भी पर्यटक आने लगे हैं। लेकिन उम्मीद है कि जल्द बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए नियमों में और छूट दी जाएगी। बीड़-बिलिंग घाटी में लॉकडाउन और फिर मानसून के बाद अब पैराग्लाइडिंग 16 सितंबर से शुरू होगी। 




इंतजार में पायलट

अक्टूबर-नवंबर में होता है पर्यटन सीजन

बीड़-बिलिंग घाटी में हर साल अक्टूबर व नवंबर में पर्यटन सीजन होता है। इस दौरान यहां पर्यटक पैराग्लाइडिंग, ट्रैकिंग, साइकलिंग व स्काई साईकलिंग का आनंद उठा सकते हैं। यहां पर्यटकों के रहने के लिए कैंप से लेकर होटल व गेस्ट हाउस है। कैंप कस्बा के एमडी अरविंद पाल का कहना है कि कैंप कस्बा हम पहली अक्टूबर से शुरू करने जा रहे हैं। इसमें 25 सौ रुपये तक दो लोगों के लिए कैंप उपलब्ध होगा। लैडिंग के समीप रामसेल होटल के एमडी सदा ठाकुर कहते हैं कि हमने सरकार के निर्देश के अनुसार होटल शुरू कर दिया है, पर्यटक आ रहे हैं। 



आप भी लिजिए पैराग्लाइडिंग का आनंद

बीड़ बिलिंग में आप पैराग्लाइडिंग का आनंद 2000 से 2500 रुपये के बीच में ले सकते हैं। धौलाधार एडवेंचर के जयोति ठाकुर व एचपी एडवेंचर के राजू बताते हैं कि पैराग्लाइडिंग यहां सही ढंग से अक्टूबर से ही शुरू हो पाएगी। यहां कोई भी पर्यटक एक अनुभवी पायलट के साथ आसमान में उड़ान का आनंद ले सकता है। कोरोना को लेकर हम पूरी सावधानी बरतेंगे। यहां उड़ान के लिए 2000 से 2500 रुपये निर्धारित हैं। इसमें पायलट की तरफ से कैमरा भी उपलब्ध करवाया जाता है। साथ इसमें बिलिंग तक ट्रांसपोर्ट भी शामिल होती हैं। 


पर्यटकों के लिए नियम हिमाचल
हिमाचल सरकार ने पर्यटकों के लिए कुछ नियम बनाए हैं। उनके लिए कोरोना की नेगेटिव रिपार्ट जरूरी है। प्रत्येक पर्यटक को होटल का नाम और उस होटल में प्रमाणिक बुकिंग की जानकारी देनी होगी। पर्यटन विभाग की एसओपी में स्पष्ट किया है कि पहले कम से कम पांच दिन के लिए होटल बुकिंग करवाने वाले सैलानियों को प्रदेश में एंट्री दी जा रही है। अब सरकार ने पांच दिन की अवधि को घटाकर दो रात कर दिया है। अब सैलानी 96 घंटे पहले करवाई गई कोरोना जांच की निगेटिव रिपोर्ट लेकर प्रदेश के बॉर्डर पर पहुंच सकेंगे। पहले 72 घंटे की रिपोर्ट पर ही आने दिया जाता था। दस साल से कम आयु के बच्चों को जांच रिपोर्ट लेकर आने की शर्त को भी हटा दिया गया है। इससे अधिक आयु वालों को निगेटिव रिपोर्ट लानी होगी। उम्मीद है कि 15 सितंबर के बाद इसमें ओर बदलाव किया जाए। 



Tuesday, 10 April 2018

न सड़क के हाल पर चर्चा, न सरकारी स्कूलों के माहौल पर टकराव

हिमाचल प्रदेश में एक खतरनाक युद्ध चल रहा है। इसमें आम जनता व बच्चों का कत्ल किया जा रहा है। यह कत्ल भी ऐसा, जिसके ल‍िए कहीं न कहीं सिस्टम की लापरवाही जिम्मेवार है। लेकिन आरोपी कोई बनता नहीं। यह कत्ल एक हादसों में रूप में किया जा रहा है। हिमाचल में जितनी मौतें बीमारी से नहीं हो रही हैं, उससे कई गुणा अधिक ताबूत बन रही बसों के दुर्घटनाग्रस्‍त होने से हो रही हैं। पिछले दस सालों का ही आंकड़ा देखें तो दस हजार लोग हिमाचल में हादसों में मौत का शिकार हो चुके हैं और इसमें सबसे अधिक मौतें बस हादसों में हुई हैं। हर बार दोष हम खराब बसों व चालकों को दे रहे हैं। लापरवाही पर बहस शुरू होती है और उसके बाद एक ऐसी जांच के आदेश निकलते है, जिस जांच का परिणाम क्या निकला, यह कोई नहीं जान पाया। लेकिन हिमाचल में हादसों के सबसे बड़े कारण 'खराब सड़कों'  पर न कभी बहस, न कोई चर्चा, न सत्ता व विपक्ष में टकराव और न ही बेतुके मुद्दों पर प्रदर्शन करने वालों का गुस्सा प्रकट हो पाया।

राजधानी शिमला हो या धर्मशाला...अच्छी खूबसूरत सड़क पर भी कुछ समय बाद तारकोल की मोटी परत बिछा कर उसकी खूबसूरती को बढ़ा कर हिमाचल की खूबसूरत तस्वीर पेश करने का प्रयास तो होता है। लेकिन गांवों की बदसूरत, बदहाल सड़कों को सुधारने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता। नूरपुर में हादसा होता है, हर तरफ सुई स्कूल बस व स्कूल पर घूम रही है...पुलिस ने भी स्कूल बसों की चेकिंग बढ़ा दी है। लेकिन कहीं भी खराब सड़कों पर कोई चर्चा नहीं होती। इस ब्लैक स्पॉट को एक ट्रक हादसे के बाद भी ठीक न करने वाले अधिकारियों से लेकर सुपरवाइजर तक कोई कार्रवाई की बात नहीं उठती। कुछ उठता है तो उस स्कूल पर जिस स्कूल की वो आभागी बस थी। हादसे वाले स्थान में सड़क ठीक होती, कुछ दिन पहले गिरे ट्रक के बाद सबक लेकर संबंधित कनिष्ठ अभियंता या सुपरवाइजर वहां क्रैश बैरियर लगवाता, तो आज नन्हें मुन्हों बच्चों से एक गांव विरान नहीं होता।

हादसे ने दूसरा सबसे बड़ा सवाल हिमाचल में सरकारी स्कूलों के माध्यम से घर द्वार तक शिक्षा पहुंचाने का जोरदार प्रचार करने वाली सरकारों की कार्यप्रणाली पर भी उठाया है। यहां के सरकारी स्कूलों में सबसे क्वालीफाई व सबसे अधिक वेतन लेने वाला स्टाफ होने के बावजूद भी पढ़ाई का ऐसा माहौल तैयार नहीं किया जा रहा कि यह स्कूल भी निजी स्कूलों का मुकाबला कर सकें। करोड़ों पैसा स्टाफ भर्ती करने से लेकर भवन बनाने में हर गांव में खर्च किया जा रहा है। लेकिन माहौल शून्य का शून्य। जिस प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल की तर्ज पर विकसित करने की कवायद में खरीदे गए झूले आंगनबाड़ी केंद्रों के स्टोरों में धूल फांक रहे हों, वहां शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने की कवायद कैसे आगे बढ़ पाएगी। आज हर गांव पंचायत में अच्छा सरकारी स्कूल है। लेकिन अब भी पुरानी शिक्षा पद्धति से लेकर हिंदी मीडियम में फेर में फंसे यह स्कूल बच्चों को अपनी तरफ रिझा ही नहीं पा रहे हैं।

तो सवाल यह है कि आखिर यह स्कूल हैं किसके लिए, केवल अध्यापकों को चंद बच्चों के आसरे वेतन देने के लिए या फिर मतदान के समय मतदान केंद्र बनाने के लिए। सरकारी व निजी स्कूलों का मसला आज जातिवाद की तर्ज पर एक मुद्दा है। लेकिन इस पर कभी किसी ने चर्चा नहीं की। जातिवाद पर आंदोलन होता है, लेकिन निजी व सरकारी स्कूलों के बीच पैदा हो रहे जातिवाद को कौन खत्म करेगा। सरकारी स्कूलों शिक्षकों के तबादलों पर जरूर चर्चा होती है, रोजाना सचिवालय में सबसे अधिक तबादलों के मामले पहुंचते है। लेकिन सरकारी स्कूलों को किस ढंग से अंग्रेजी माध्यम में बदला जाए, यह कोई सवाल उठाने वाला नहीं। अगर घर द्वार में ही शिक्षा का इंतजाम होता, तो शायद आज यह मासूम जिंदा होते। आज हालात यह है कि नौकरी करने के लिए सबसे अच्छा सरकारी स्कूल लगने लगता है, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी स्कूल ही बेस्ट है। जबकि सरकारी स्कूल में चयन सबसे बेहतर होता है, उस चयन से जो बच जाएं, वह निजी स्कूलों में सेवाएं देते हैं। फिर क्या कारण है कि हिमाचल के सरकारी स्कूल अब भी खाकी व नीली वर्दी के तगमे से बाहर नहीं निकल पा रहे।

स्कूलों में खासकर हिमाचल में न बच्चों को सरकारी स्कूलों में खिचड़ी की जरूरत है और न ही निशुल्क पुरानी या नई किताबों या वर्दी की। जरूरत है, तो केवल एक अच्छे शिक्षा के माहौल के जो निजी स्कूलों में मिल रहा है। एक ऐसे माहौल की जो सरकारी कॉलेजों में मिलता है। छात्र संगठन भी छात्रों के दर्द को विश्वविद्यालय व कॉलेजों की सीमा से हटाकर स्कूलों की दहलीज तक समझे, तो काफी कुछ बदल सकता है। नहीं तो रोजाना बच्चों को दस से 150 किमी का निजी स्कूलों तक जाने का सफर यूं ही लीलता रहेगा। अगर शिक्षा का ढांचा बदला होता, तो नूरपुर के खुआड़ा गांव के बच्चे आज घर के बाहर स्थापित मीडिल स्कूल में पढ़ रहे होते, उन्हें गांव से आठ किमी दूर जाने की जरूरत तक नहीं होती।

सत्ता के सुर सियासी मंच से नई सड़के बनाने की घोषणा तो करते हैं, लेकिन सड़कों को सहजने का कार्य कौन करें यह कोई नहीं बताता। गांवों की सड़कों में प्रधानमंत्री सड़क योजना का व्याख्यान लगा बोर्ड तो होता है, लेकिन उसकी रिपेयर के समय अवधि में उसकी रिपेयर होती है या नहीं यह अधिकारियों से लेकर उस क्षेत्र के नुमाइंदों की आंखे तक नहीं देख पाती।

Saturday, 19 August 2017

दरकता पहाड़ और उजाड़ कोटरोपी

दरकता पहाड़ और उजाड़ कोटरोपी। 46 लोगों की मौत के बाद कोटरोपी का मलबा अब शांत हो गया है। लेकिन हादसे के बाद अब भी दो लोग लापता हैं। यह हादसा कई परिवारों को ऐसे जख्म दे गया है, जिसकी भरपाई शायद कभी न हो सके। देवभूमि की वादियों में घूमने आ रहे उत्तर प्रदेश के चार परिवारों को तो यह हादसा पूरी तरह से लील गया। लेकिन इस सच से इतर एक दूसरा खौफनाक सच अब भी त्रासदी की चादर में लिपटा हुआ है। क्योंकि यह न तो पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले लोग थे और न ही इन्हें कहीं जाना था। यह पर्यटक भी नहीं है जो खुली आबो-हवा में जिंदगी तर कर कुछ समय बाद लौट जाएंगे। इनका सच ही इनकी त्रासदी है, इन्हें कहीं लौटना नहीं है। यह लोग है हिमाचल के मंडी जिला के कोटरोपी सहित आसपास के कई गांवों के। जहां इस भूस्खलन ने इन्हें पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है। तो जोगेंद्रनगर से लेकर मंडी तक 50 किलोमीटर लंबे एनएच के किनारे बसे कई गांवों के लोगों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब यहां के पहाड़ शांत नहीं है। यह सारा हिस्सा एक पहाड़ के नीचे से होकर ही गुजरता है। सबसे अधिक त्रासदी यहां के पांच गांवों बड़वाहण, कोटरोपी, सराजबादला व दो अन्य की है। जहां घर तो सुरक्षित है, लेकिन कब पहाड़ फिर गुस्से में उन्हें तबाह कर दे कोई नहीं जानता। यहां के सैकड़ों लोगों के सामने संकट यह है कि पहाड़ के टूट कर गिरने के बाद जिदंगी जीने का हर रास्ता बंद होने लगा है। यहां की जमीन का एक बड़ा हिस्सा मलबे से भर चुका है। यानी खेत खलिहान मिट्टी और पानी के साथ भी बंजर हो गए है। तो जिदंगी अस्थायी ठिकानों में कट रही है। स्थायी ठिकाने तो हैं लेकिन उसके उपर पहाड़ की दशहत है। यानी उन घरों में अब कोई रहने का रिस्क उठाना नहीं चाहता।

यानी पहाड़ का जीवन पहले से ही संघर्ष के आसरे चलता है उसपर गुस्साए पहाड़ ने इस संघर्ष को और बढ़ा दिया है। इन गांवों का सुकून वाला पल एक ही है कि इस बड़ी त्रासदी में एक भी घर में कोई नुकसान या अनहोनी नहीं हुई। पहाड़ का गुस्सा आधी रात को उसकी छाती से होकर गुजरने वाले एनएच से जा रही दो बसों, बाइकों व कारों पर तो फूटा, लेकिन निकट बसे घरों को आंशिक नुकसान पहुंचाने तक ही सिमट गया। यह पहला हादसा है, जब चलती बसों पर पहाड़ फूटा हो और चंद सेकेंड में बसों का नामोनिशान मिट गया हो। इस हादसे ने कई सवाल पैदा कर दिए हैं। बादल फटने से लेकर  अब तक बस हादसों से दहल रहे हिमाचल में अब यह नया खौफ आ गया है। हिमाचल का दर्द यह है कि ऐसे हादसों से निपटने के लिए कुछ हो भी नहीं सकता है, क्योंकि हिमाचल की 90 प्रतिशत सड़के पहाड़ की छाती से होकर गुजरती है और कौन पहाड़ कमजोर हैं और कौन कब गिरने वाला है, ऐसी प्रणाली को अभी इसरो भी विकसित नहीं कर सका है, तो सरकार क्या कर पाएगी। अब पहाड़ का गुस्सा झेलने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। लेकिन एक बात जरूर है कि पहाड़ गुस्से में तब आने लगे है, जब सुरंगों के जाल से लेकर सीमेंट फैक्टरी, बांधों के पानी के लिए सुरंगों खोदने व पहाड़ों में सड़कों के जाल बिछाने का ग्राफ बढ़ा दिया गया है।


हादसे की रेंज से ही चंद किमी पीछे गुम्मा में भी चट्टानी नमक के लिए बिछे सुरंगों के जाल को पहाड़ ने इस कदर मिटा डाला था कि आज तक न सुरंगों का नमोनिशां मिला है और न ही उस इलाके का। हिमाचल में प्रकृति का तांडव दो दशक से ही शुरू हुआ है, जो कहीं न कहीं यह संकेत जरूर दे रहा है कि प्रकृति से इंसान की छेड़छाड़ बढ़ेगी तो पहाड़ से लेकर नदियां भी उसका पूरा जबाव देंगी। अब देखना सरकार को ही नहीं बल्कि यहां की जनता को भी कौन से कदम उनके हित में हैं और कौन से नहीं। प्रकृति को विनाश के गर्त में ले जाने वाले प्रोजेक्टों को एनओसी देने से पहले पंचायतों को भी गंभीर होना होगा और गांव के विकास के लिए चंद
सि‍क्‍कों के लालच की बजाए भविष्य को दांव में लगाने से बचना होगा।

Friday, 28 July 2017

31 जुलाई की उस रात को याद कर आज भी सिहर उठता है बैजनाथ

31 जुलाई 2001 की रात। बारिश का दौर लगातार बढ़ता जा रहा था। आसमानी बिजली हर किसी को डरा रही थी। मैं बारिश के कारण बैजनाथ फंसा हुआ था। रात करीब साढ़े 11 बजे मैंने वहां अपने एक मित्र से स्कूटर लेकर बारिश में ही घर निकलने का निर्णय लिया। धीमी सी स्कूटर की लाइट और आगे गिरते पत्थर बेहद खौफनाक मंजर पेश कर रहे थे। खीर गंगा मोड़ के पास पहुंचा तो बिनवा का रूख बेहद अशांत लग रहा था। बिनवा उस दिन अजीब सी आवाज में बह रही थी। बरसात है, इस कारण पानी बढ़ा होगा ऐसे में ध्यान नहीं दिया। लेकिन जैसे ही बिनवा पुल के पास पहुंचा, तो ठीक पुल के नीचे श्मशान घाट वाली साइड में बिनवा के बिल्कुल किनारे पर उस समय बनी झोल भट्ठी में लगे बल्ब की रोशनी से बिनवा में भी कुछ रोशनी पड़ रही थी। स्कूटर किनारे खड़ा कर पुल से ही बिनवा को देखने की उत्सुकता जगी। उस समय एक कार भी वहां रूकी। नीचे देखा तो बिनवा का मंजर भयानक था। कुछ मिनट बाद भयंकर आवाज आना शुरू हुई, आवाज को सुनकर झोल भट्ठी से भी कुछ लोग बाहर निकले। पानी एकाएक बढऩे लगा, आवाज बेहद तेज हो चली। कुछ ही पलों में सामने नजारा बेहद भयानक था। कई फुट ऊंची पानी की लहर आगे बढ़ रही थी, उसके साथ पत्थरों से लेकर पेड़ों का एक सैलाब बहकर आ रहा था। पुल को छोड़कर मैंने ओर कार में मौजूद लोग भी वहां से तुरंत भागे। आवाज को सुनकर कई वाहन वहां खड़े हो गए थे।

रोशनी थी नहीं लेकिन आसमानी बिजली की धार में बिनवा के विकराल रूप को साफ देखा जा रहा था। उस सैलाब से बेहद गंदी बदबू आ रही थी। जैसे ही वो बिनवा में आया वो सैलाब बिनवा पुल के पास पहुंचा, तो एक अजीब सी धरती में कंपन होने लगी। झोल भट्ठी में लगा बल्ब गायब हो चुका था। ऐसा लग रहा था कि बिनवा यह पुल भी बह कर ले जाएगी। वहां उस आवाज को देखकर करीब 10-15 वाहन भी रूक गए थे। लोग नीचे देखने का प्रयास कर रहे थे। करीब एक घंटे तक वो ही मंजर रहा। पुल से कुछ वाहन गुजरते रहे। उस दौर में न मोबाइल थे और न ही डिजीटल का कोई दौर की इस नजारे को किसी न किसी ढंग से कैद करते। कुछ शक तो हो रहा था कि कुछ न कुछ गड़बड़ उपर हुई है। इसके बाद घर पहुंचा। कुछ नींद आई, तो वो सारा मंजर सपने की तरह लग रहा था। सुबह पांच बजे उठकर मंद सी रोशनी में मैं उतराला सड़क की तरफ पहुंचा कि नीचे देखता हूं कि रात को हुआ क्या था। चूंकि उस समय मैं पत्रकारिता में प्रवेश कर चुका था, ऐसे में जानने की उत्सुकता भी काफी थी। जैसे ही उतराला रोड में पहुंचा तो नीचे का मंजर बेहद भयानक था। बिनवा की धारा अब भी काले रंग के पानी के साथ तेज था। खीर गंगा घाट गायब हो चुका था। पैदल ही बिनवा पुल के पास पहुंचा, तो लोग वहां पहुंच चुके थे। झोल भट्ठी का कुछ मलबा ही बचा था। बिनवा के बस व रेल पुल के बीच बने पुराने पुल के नीचे लगे लोहे की रेलिंग में कूड़ा व कुछ लकडिय़ां फंसी थी। जो खुद बयां कर रही थी कि पानी का रात को लेबल कितना था। खीर गंगा घाट के पास से बिनवा अपना मार्ग बदल चुकी थी। यहां बने टापू के दूसरी तरफ केवल रेत का ही एक बड़ा मैदान था। कुछ देर बाद पता चला कि रात को धौलाधार में बादल फटा है और बिनवा व लुनी खड्डों के कैचमैंट एरिया से यह सारा पानी नीचे पहुंचा है। फिर पूरे नुकसान की रपट बनाने के लिए मैं और मेरे साथी पत्रकार श्री अश्वनी सूद जी एक छोटे से स्कूटर में बाढ़ की रपट करने के लिए दियोल की तरफ निकल पड़े। दियोल को जोडऩे वाला मुख्य पुल बह चुका था। वहां मंजर बेहद भयानक था। एक छोटे से नाले के रूप में बहने वाली लुनी खड्ड के ताडंव की तस्वीर सामने दिख रही थी। दियोल को जाने का कोई रास्ता नहीं था।

हम फिर वापस लौटे और पपरोला से उतराला की तरफ निकले। बारिश अब भी नहीं थम रही थी।  उतराला के बिनवा नगर में जैसे ही पहुंचे, तो वहां की बिनवा नगर की कालोनी की तस्वीर भी बिगड़ चुकी थी। बिनवा के किनारे के कुछ मकान व गोदाम बह चुके थे, तो कुछ अधर में लटके हुए थे। पावर हाउस सिल्ट के कारण बंद हो चुका था। उस समय के पावर हाउस के कुछ अधिकारी नुकसान की जानकारी लेने के लिए पावर हाउस के बांध व पर्रई के पास जहां से पानी मोड़ा गया है। वहां जा रहे थे। तो उसने जानकारी पता चली कि उनके एक कर्मचारी केहर सिंह लापता हो गया है। पहली उनकी ही टीम वहां जा रही है। हम भी उनके साथ निकले, तो करीब सात किलोमीटर पैदल चलकर जब बिनू व परई के संगम स्थान, जहां से बिनवा बनती है पहुंचे तो नजारा बेहद खौफनाक था। दोनों नालों के बीच बना कंट्रोल रूम गायब था। वहां कुछ नहीं बचा था। बिनवा प्रोजेक्ट के डैम को यहां से जानी वाली सुरंग का गेट बंद था। फिर पता चला कि रात को केहर सिंह ने नीचे कंट्रोल रूम में सूचना दी थी कि यहां पानी बढ़ रहा है और वह सुरंग का गेट बंद कर रहा है। उसके बाद फोन का संपर्क कट गया था। शाम तक पता चला कि यह एक बड़ी त्रासदी यहां हुई है और इससे यहां संपत्ति को नहीं बल्कि काफी जानी नुकसान भी हुआ है। उस समय आंकड़ों के अनुसार यहां दस के करीब लोगों के मारे जाने की सूचना थी जबकि सैकड़ों पशु बह गए थे। जालसू जोत्त में भी काफी नुकसान हुआ था। लेकिन वहां कितने लोग मरे थे, उसका आंकड़ा नहीं मिल पाया था। उस त्रासदी के जख्म भले ही अब भरे हो, लेकिन जिन लोगों ने भी उस मंजर को देखा था, वो आज भी उस मंजर को देखकर सहम उठते। आज भी उस पूरी घाटी में मरघट सी एक खामोशी है। उतराला बैल्ट पर प्रकृति अब तक शांत है। लेकिन दियोल की तरफ इस घटना की ठीक दो साल बाद फिर से लुलाणी गांव में बादल फटा था। इससे वहां पांच लोगों की मौत हो गई थी। वो गांव अब भी अपनी कहानी बयां करता है। भले ही यह बातें अब इतिहास बन रही हो, लेकिन भविष्य के लिए यह घटनाएं कई सवाल खड़े कर गई है।

-मुनीष दीक्षित।

Sunday, 16 July 2017

विकास के वादे के आगे हार गई बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत

बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत के छह पार्षदों ने अपने ही अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जनता के समक्ष विकास के झूठे वादों से हार रहे इन पार्षदों ने खुद आगे आकर अपनी सही तस्वीर बताने का प्रयास किया है कि विकास हो नहीं रहा और जो कहीं हो रहा है, उन बारे वह नहीं जानते। वर्ष 2014 से विरोध के बीच शुरू हुई बैजनाथ-पपरोला नगर पंचायत में अंतिम सहमति लोगों ने इस कारण बनाई थी कि विकास की बढ़त में यह जरूरी है और सुविधाएं भी उन्हें मिलेगी। उस समय यहां की 10 हजार से अधिक की आबादी को सफाई से लेकर स्वच्छ पेयजल, पक्के रास्तों से लेकर स्ट्रीट लाइट व दोनों शहरों में पार्किंग से लेकर बेहतरीन सफाई व्यवस्था के बड़े बड़े सब्जबाग दिखाए गए थे। इन्हीं उम्मीदों के आसरे कुछ विरोध के बाद सभी 11 वार्डों के लोगों ने अपना समर्थन नगर पंचायत को दिया। उम्मीद विकास की थी, लेकिन यह उम्मीद आज तीन साल के कार्यकाल की तरफ बढ़ रही नगर पंचायत पूरी ही नहीं करवा पाई है। अब स्ट्रीट लाइट के सहारे यहां के लोगों को विकास की कुछ रोशनी दिखाने का प्रयास तो किया जा रहा है। लेकिन सफाई व्यवस्था में नगर पंचायत इस कदर पिट चुकी है कि यह रोशनी कुछ नहीं कर पा रही है। सभी वार्डों के टूटे रास्ते नगर पंचायत के विकास में कंकरीट बनने का सपना तो देख रहे हैं, लेकिन अब तक रास्तों को मरम्मत का मरहम तक भी नहीं लग पाया है। गांव गांव से कूड़ा उठाने की व्यवस्था कुछ दिन में ही धराशायी हो गई, सवाल उठे तो डपिंग साइट न होने को एक बड़ा कारण बता दिया गया। पेयजल क‍ितनी स्‍वच्‍छ व शुद्ध है इस बात का अंदाजा आप आजकल नलों से पानी भरकर खुद देख सकते है। बेशक पेयजल में अभी भी सरकार व व‍िभाग का रोल हो। लेकिन इस खराब जल पर सवाल तो स्‍थानीय प्रत‍िन‍िध‍ि ही उठाएंगे। बैजनाथ व पपरोला दो शहरों को जहां शिव मंदिर, प्रदेश के सबसे बड़ा पंचायती राज संस्थान, बड़े रेलवे जंक्शन, आयुर्वेदिक कॉलेज व जवाहर नवोदय विद्यालय होने के कारण कुछ गर्व हो, लेकिन इन शहरों का हाल मौजूदा दौर में पंचायतों की व्यवस्था के आगे से भी हार गया है। यानी पंचायत के समय में ही यहां जो व्‍यवस्‍थाएं थी, वो भी उच‍ित थी।
सवाल यही पैदा होता है कि पिछले ढ़ाई साल के कार्यकाल में यहां हुआ क्या है। छह पार्षदों का गुस्सा भी जायज है। क्योंकि सवालों के तीर सीधे पार्षदों को झेलने पड़ते है। लेकिन व्‍यवस्‍था पर यह भी सवाल है क‍ि सभी पार्षद अभी तक कुछ कर क्‍यों नहीं पाए। छह पार्षदों के अविश्वास पत्र के बाद अब यहां के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की कुर्सी हिलने के संकेत मिलने लगे है। तो अब जोड़ तोड़ की राजनीत‍ि भी शुरू हो गई है। अविश्वास पत्र में ही हस्ताक्षर करने वाले एक पार्षद को अब उसके पुराने मामले की फाइल निकालने तक की धमकी सूत्रों के हवाले से म‍िल रही है। तो अन्‍य पार्षदों को भी कुछ लोगों द्वारा गुमराह क‍िए जाने की बात कहीं जा रही है।
यानी व‍िकास के समय पर अब यहां कुछ मह‍िने राजनीत‍ि भी हवा में रहेगी। और व‍िकास बढ़ नहीं पाएगा फ‍िर व‍िकास व‍िधानसभा चुनाव की आचार संह‍िता में दब जाएगा। ऐसे में नगर पंचायत के पूरे स‍िसटम पर ही सवाल उठने लग पड़ा है क‍ि यहां सरकार से लेकर पार्षद अब तक व‍िकास से लेकर व्‍यवस्‍थाओं का खाका क्‍यों तैयार नहीं कर पाए। गांव गांव की पद यात्रा कर रहे व‍‍िपक्ष की धार क्‍यों लोगों की आवाज को उठाने में अब तक व‍िफल रही। यहां सवालों के बीच स्‍थानीय विधायक क‍िशोरी लाल के अच्‍छे कार्य को भी नहीं भूला जाना चाह‍िए कि उन्‍होंने बैजनाथ का पंचायत प्रधान रहते हुए हर वो सुविधा पंचायत में दी जो नगर पंचायत में अब तक नहीं म‍िल पा रही है और अब भी जब सफाई को लेकर नगर पंचायत हार रही थी, तो व‍िधायक ने ही अपने स्‍तर पर इसका इंतजाम करवाया।
 अगर इस राजनीति को छोड़ दे तो नगर पंचायत की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल दोनों कस्बों में चल रही पंचायतों की दुकानों पर भी उठ रहा है। इन दुकानों में बिना किराये के कई दुकान वर्षों से डटे हुए है। कई दुकानें आगे सबलेट कर दी गई है। अधिकांश दुकानदार अन्य शहरों के है। जबकि यहां का बेरोजगार सड़कों के किनारे रेहड़ी फड़ी लगाकर कैसे रोजगार कमा रहा है, इसे आप मझैरणा रोड से लेकर बैजनाथ तक देख सकते हैं। व्यवस्था पर सवाल यह है कि इन दुकानों को अभी तक नगर पंचायत अपने अधीन कर ही नहीं पाई है। इन दुकानदारों से लाखों की वसूली कौन करेगा, इस पर सब चुप है। ऐसे में विकास की दौड़ में असफल हो रही नगर पंचायत के समक्ष जो हो रहा है। जो पार्षदों का गुस्सा निकला है, वो कहीं न कहीं अब जायज है। यह अलग बात है कि विश्वास व अविश्वास की दौड़ में इन छह पार्षदों का यह निर्णय कब तक टिका रहता है। यह देखने लायक होगा। नगर पंचायत में सरकार के ईनाम के रूप में तीन मनोनीत पार्षद भी है। लेकिन यहां की समस्याएं जस की तस है। वो भी अब तक क‍िसी मसले को लेकर आगे नजर आए नहीं। सवाल अब भी यही है कि नगर पंचायत में विकास शुरू कब होगा। क्योंकि घिरथोली से लेकर पंतेहड़ व बुहली कोठी से लेकर खतरेहड़ तक एक ही सवाल है कि जब व्यवस्था बना नहीं पा रहे, तो फिर विकास के वादों के सहारे चुनाव लड़े भी क्यों?
अगर व‍िकास हुआ है या हो रहा है, तो उसे जाहिर क्‍यों नहीं क‍िया जा रहा।

अब तो यही शेयर याद आ रहा है, कौन डूबेगा किसे पार उतरना है " ज़फ़र"..... फ़ैसला वक्त के दरिया में उतर कर होगा।

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