Tuesday, 10 April 2018

न सड़क के हाल पर चर्चा, न सरकारी स्कूलों के माहौल पर टकराव

हिमाचल प्रदेश में एक खतरनाक युद्ध चल रहा है। इसमें आम जनता व बच्चों का कत्ल किया जा रहा है। यह कत्ल भी ऐसा, जिसके ल‍िए कहीं न कहीं सिस्टम की लापरवाही जिम्मेवार है। लेकिन आरोपी कोई बनता नहीं। यह कत्ल एक हादसों में रूप में किया जा रहा है। हिमाचल में जितनी मौतें बीमारी से नहीं हो रही हैं, उससे कई गुणा अधिक ताबूत बन रही बसों के दुर्घटनाग्रस्‍त होने से हो रही हैं। पिछले दस सालों का ही आंकड़ा देखें तो दस हजार लोग हिमाचल में हादसों में मौत का शिकार हो चुके हैं और इसमें सबसे अधिक मौतें बस हादसों में हुई हैं। हर बार दोष हम खराब बसों व चालकों को दे रहे हैं। लापरवाही पर बहस शुरू होती है और उसके बाद एक ऐसी जांच के आदेश निकलते है, जिस जांच का परिणाम क्या निकला, यह कोई नहीं जान पाया। लेकिन हिमाचल में हादसों के सबसे बड़े कारण 'खराब सड़कों'  पर न कभी बहस, न कोई चर्चा, न सत्ता व विपक्ष में टकराव और न ही बेतुके मुद्दों पर प्रदर्शन करने वालों का गुस्सा प्रकट हो पाया।

राजधानी शिमला हो या धर्मशाला...अच्छी खूबसूरत सड़क पर भी कुछ समय बाद तारकोल की मोटी परत बिछा कर उसकी खूबसूरती को बढ़ा कर हिमाचल की खूबसूरत तस्वीर पेश करने का प्रयास तो होता है। लेकिन गांवों की बदसूरत, बदहाल सड़कों को सुधारने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता। नूरपुर में हादसा होता है, हर तरफ सुई स्कूल बस व स्कूल पर घूम रही है...पुलिस ने भी स्कूल बसों की चेकिंग बढ़ा दी है। लेकिन कहीं भी खराब सड़कों पर कोई चर्चा नहीं होती। इस ब्लैक स्पॉट को एक ट्रक हादसे के बाद भी ठीक न करने वाले अधिकारियों से लेकर सुपरवाइजर तक कोई कार्रवाई की बात नहीं उठती। कुछ उठता है तो उस स्कूल पर जिस स्कूल की वो आभागी बस थी। हादसे वाले स्थान में सड़क ठीक होती, कुछ दिन पहले गिरे ट्रक के बाद सबक लेकर संबंधित कनिष्ठ अभियंता या सुपरवाइजर वहां क्रैश बैरियर लगवाता, तो आज नन्हें मुन्हों बच्चों से एक गांव विरान नहीं होता।

हादसे ने दूसरा सबसे बड़ा सवाल हिमाचल में सरकारी स्कूलों के माध्यम से घर द्वार तक शिक्षा पहुंचाने का जोरदार प्रचार करने वाली सरकारों की कार्यप्रणाली पर भी उठाया है। यहां के सरकारी स्कूलों में सबसे क्वालीफाई व सबसे अधिक वेतन लेने वाला स्टाफ होने के बावजूद भी पढ़ाई का ऐसा माहौल तैयार नहीं किया जा रहा कि यह स्कूल भी निजी स्कूलों का मुकाबला कर सकें। करोड़ों पैसा स्टाफ भर्ती करने से लेकर भवन बनाने में हर गांव में खर्च किया जा रहा है। लेकिन माहौल शून्य का शून्य। जिस प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल की तर्ज पर विकसित करने की कवायद में खरीदे गए झूले आंगनबाड़ी केंद्रों के स्टोरों में धूल फांक रहे हों, वहां शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने की कवायद कैसे आगे बढ़ पाएगी। आज हर गांव पंचायत में अच्छा सरकारी स्कूल है। लेकिन अब भी पुरानी शिक्षा पद्धति से लेकर हिंदी मीडियम में फेर में फंसे यह स्कूल बच्चों को अपनी तरफ रिझा ही नहीं पा रहे हैं।

तो सवाल यह है कि आखिर यह स्कूल हैं किसके लिए, केवल अध्यापकों को चंद बच्चों के आसरे वेतन देने के लिए या फिर मतदान के समय मतदान केंद्र बनाने के लिए। सरकारी व निजी स्कूलों का मसला आज जातिवाद की तर्ज पर एक मुद्दा है। लेकिन इस पर कभी किसी ने चर्चा नहीं की। जातिवाद पर आंदोलन होता है, लेकिन निजी व सरकारी स्कूलों के बीच पैदा हो रहे जातिवाद को कौन खत्म करेगा। सरकारी स्कूलों शिक्षकों के तबादलों पर जरूर चर्चा होती है, रोजाना सचिवालय में सबसे अधिक तबादलों के मामले पहुंचते है। लेकिन सरकारी स्कूलों को किस ढंग से अंग्रेजी माध्यम में बदला जाए, यह कोई सवाल उठाने वाला नहीं। अगर घर द्वार में ही शिक्षा का इंतजाम होता, तो शायद आज यह मासूम जिंदा होते। आज हालात यह है कि नौकरी करने के लिए सबसे अच्छा सरकारी स्कूल लगने लगता है, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी स्कूल ही बेस्ट है। जबकि सरकारी स्कूल में चयन सबसे बेहतर होता है, उस चयन से जो बच जाएं, वह निजी स्कूलों में सेवाएं देते हैं। फिर क्या कारण है कि हिमाचल के सरकारी स्कूल अब भी खाकी व नीली वर्दी के तगमे से बाहर नहीं निकल पा रहे।

स्कूलों में खासकर हिमाचल में न बच्चों को सरकारी स्कूलों में खिचड़ी की जरूरत है और न ही निशुल्क पुरानी या नई किताबों या वर्दी की। जरूरत है, तो केवल एक अच्छे शिक्षा के माहौल के जो निजी स्कूलों में मिल रहा है। एक ऐसे माहौल की जो सरकारी कॉलेजों में मिलता है। छात्र संगठन भी छात्रों के दर्द को विश्वविद्यालय व कॉलेजों की सीमा से हटाकर स्कूलों की दहलीज तक समझे, तो काफी कुछ बदल सकता है। नहीं तो रोजाना बच्चों को दस से 150 किमी का निजी स्कूलों तक जाने का सफर यूं ही लीलता रहेगा। अगर शिक्षा का ढांचा बदला होता, तो नूरपुर के खुआड़ा गांव के बच्चे आज घर के बाहर स्थापित मीडिल स्कूल में पढ़ रहे होते, उन्हें गांव से आठ किमी दूर जाने की जरूरत तक नहीं होती।

सत्ता के सुर सियासी मंच से नई सड़के बनाने की घोषणा तो करते हैं, लेकिन सड़कों को सहजने का कार्य कौन करें यह कोई नहीं बताता। गांवों की सड़कों में प्रधानमंत्री सड़क योजना का व्याख्यान लगा बोर्ड तो होता है, लेकिन उसकी रिपेयर के समय अवधि में उसकी रिपेयर होती है या नहीं यह अधिकारियों से लेकर उस क्षेत्र के नुमाइंदों की आंखे तक नहीं देख पाती।

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